जूरी सिस्टम और जज सिस्टम में कौनसी प्रणाली बेहतर है

जूरी सिस्टम और जज सिस्टम में कौनसी प्रणाली बेहतर है ?
(a) जूरी सिस्टम : जूरी सिस्टम का मूल विचार यह है कि दंड देने की शक्ति लगातार भिन्न व्यक्तियों के हाथ में हस्तांतरित होती रहे, ताकि दंडाधिकारी अपराधियों के साथ गठजोड़ न बना सके। जूरी सिस्टम किस तरह काम करेगा यह इसके ड्राफ्ट में दी गयी प्रक्रिया पर निर्भर करता है। आम तौर पर जूरी सिस्टम की किसी सामान्य प्रक्रिया में किसी मुकदमे की सुनवाई के लिए 25-55 आयुवर्ग के 12-15 नागरिको का चयन जिले की मतदाता सूची में से लॉटरी द्वारा किया जाता है। नागरिको के इस समूह को जूरी मंडल कहते है। यह जूरी मंडल जज की उपस्थिति में दोनों पक्षों के वकीलों द्वारा प्रस्तुत किये गए सबूत देखती है और गवाहों आदि को सुनकर अपना फैसला देती है।

प्रत्येक मुकदमे के लिए अलग जूरी होती है, और फैसला देने के बाद जूरी भंग हो जाती है। जो व्यक्ति एक बार जूरी में आ जाता है, उसे अगले 5 से 10 वर्ष तक जूरी में नहीं बुलाया जाता। प्रत्येक जूरी सदस्य अपना फैसला बंद लिफाफे में देता है, और जूरी सदस्यों के बहुमत द्वारा दिए गए फैसले को जूरी का फैसला माना जाता है। जूरी द्वारा दिए गए फैसले को जज द्वारा अनुमोदित किया जाता है, और जज चाहे तो जूरी मंडल के निर्णय में संशोधन कर सकता है।

(b) जज सिस्टम : करोड़ो नागरिको के ऊपर सरकार कुछ 200-2000 व्यक्तियों को 20-35 वर्षों के लिए नियुक्त करती है , जिन्हें जज कहा जाता है। इन मुट्ठी भर व्यक्तियों को देश के सभी मामलो में दंड देने या रिहा करने की स्थायी शक्ति दे दी जाती है। उदाहरण के लिए भारत में सभी प्रकार के मुकदमो को सुनने एवं दंड देने की अंतिम शक्ति कुछ 18,000 न्यायधीशो के पास है।

जिला स्तर पर एक शेषन जज होता है, और जिले में सभी मामलो में दंड देने की शक्ति इस एक आदमी के पास होती है। राज्य में यह शक्ति हाई कोर्ट जज के पास होती है। हाई कोर्ट जज शेषन जज को प्रमोट कर सकता है, या उसे नौकरी से निकाल सकता है। सुप्रीम कोर्ट के जजो के पास यह अधिकार है कि वह हाई कोर्ट जज को स्थानांतरित कर सके, प्रमोट कर सके या नौकरी से निकाल सके। जो व्यक्ति एक बार जज बन जाता है, उसके पास विभिन्न स्तरों पर दंड देने की यह शक्ति आजीवन बनी रहती है।

■ जज सिस्टम एवं ज्यूरी सिस्टम के बीच तुलना ।

जज सिस्टम की रफ्तार :- ज्यादातर मुकदमे एक ही व्यक्ति के पास जाते है। एक जज अपने सेवा काल में लगभग 5,000 से 20,000 मामलो में फैसला देता है। इससे मुकदमे वर्षो तक लटके रहते है।

जूरी सिस्टम की रफ़्तार :- हर मुकदमे के लिए अलग जूरी होने के कारण फैसला हफ्ते दो हफ्ते में आ जाता है। जो व्यक्ति किसी मुकदमें में फैसला दे चुका है, उसे अगले 5 वर्ष तक जूरी में नहीं बुलाया जाता।

जज सिस्टम मे गठजोड़ की निरंतरता :- 
अमूमन जज किसी अदालत में 3-4 वर्ष रहता है। पर्याप्त समय होने के कारण अपराधियों एवं वकीलों द्वारा जज से गठजोड़ बना लेना आसान हो जाता है। और यह गठजोड़ लगातार बना रहता है। कई अदालतों में जज आपस में भी गठजोड़ बनाकर रखते है, और एक दुसरे के रिश्तेदारों के पक्ष में फैसले देते है। इसे Cross-Nepotism कहते है।

ज्यूरी सिस्टम मे गठजोड़ की निरंतरता :-
ज्यूरी सदस्य अस्थायी होते है और सिर्फ हफ्ते दो हफ्ते के लिए जूरी मंडल में आते है। किसी भी वकील के लिए यह कठिन है कि वह इन 12 सदस्यों में से किन्ही 8 लोगो से चुपचाप गठजोड़ बना ले। यह काम तब और भी ज्यादा मुश्किल एवं जोखिमपूर्ण हो जाता है, जब वकील को यह काम सिर्फ हफ्ते भर में करना हो।

जज सिस्टम मे संगठित अपराध को सरंक्षण :-
यदि किसी गैंग एवं उसके सरगना के खिलाफ 4-5 वर्ष के दौरान 1000 मुकदमे दर्ज होते है तो जज सिस्टम में ये सभी मुकदमे 5-10 जजों के पास जायेंगे। तो जज सिस्टम में गवाहों को तोड़ने , उन्हें धमकाने , जांच प्रभावित करने और रिहा होने के लिए माफिया सरगना को सिर्फ 5-10 जजों से गठजोड़ बनाना है , ताकि जज उसके मामलो की सुनवाई की रफ्तार धीमी कर दे।

ज्यूरी सिस्टम मे संगठित अपराध को सरंक्षण :-
प्रत्येक मामला 12-15 नागरिको के अलग अलग जूरी मंडल के पास जाएगा, और 15*1000 = 15,000 जूरी सदस्यों का चयन लॉटरी से होगा। जूरी नियमित रूप से सुबह 11 बजे से सायं 4 बजे तक सुनवाई करती है। जूरी में अगली तारीख का मतलब होता है अगला दिन !! और इसी छोटे अंतराल में सरगना को लगभग 12,000 जूरी सदस्यों से गठजोड़ बनाना होगा। जो कि गणितीय रूप से भी एक असम्भव काम है।

जज सिस्टम दबाव में आने की सम्भावना :-
कनिष्ठ जजों की पदोन्नति, स्थानांतरण, निष्कासन आदि में वरिष्ठ जजों की भूमिका निर्णायक होती है। अत: ज्यादातर मामलो में रसूखदार आरोपी कनिष्ठ जजों को प्रभावित करवाने में सफल हो जाते है।

ज्यूरी सिस्टम दबाव में आने की सम्भावना :-
जूरी में आने वाले नागरिक किसी की नौकरी पर नहीं होते। वे सिर्फ कुछ समय के लिए किसी मामले को सुनकर फैसला देने के लिए जूरी में आते है। अत: किसी अधिकारी आदि का उन पर दबाव काम नहीं कर पाता।

जज सिस्टम मे घूस खाने के अवसर :-
घूस खाने यह बात खुली हुयी होती है कि अमुक जज ने फैसला दिया है। इस वजह से जज यदि घूस लेता है तो उसे घूस लेने वाले के हिसाब से ही फैसला देना पड़ता है। वर्ना मध्यस्थता करने वाला वकील आइन्दा उसके लिए घूस का ऑफर नहीं लेकर आएगा। इसके अलावा दबाव आने पर न चाहते हुए भी उन्हें फैसले में तबदीली करनी पड़ती है।

ज्यूरी सिस्टम मे घूस खाने के अवसर :-
जूरी सिस्टम में प्रत्येक जूरी सदस्य अपना फैसला हाँ / ना के रूप में बंद लिफ़ाफ़े में देता है। तो यदि 15 में से किन्ही 5 जरी सदस्यों को आरोपी किसी न किसी तरह से दबाव / उत्कोच से प्रभावित कर भी देता है तो वे उसके खिलाफ फैसला दे सकते है। क्योंकि यह कभी भी पता नहीं लगाया जा सकता कि किस जूरी सदस्य ने क्या फैसला दिया है।

(1.1) पेड मीडिया, राजा, राजवर्ग एवं धनिको का जूरी सिस्टम पर रूख
जज सिस्टम एक केंद्रीकृत प्रणाली है। जज सिस्टम का डिजाइन ही ऐसा होता है कि अबसर देखकर चयनात्मक न्याय किया जा सकता है। चयनात्मक न्याय से आशय है कि, जब ताकतवर या पैसे वाला आदमी पर कोई मुकदमा कायम होगा तो वह जज पर दबाव बनाकर या उसे घूस खिलाकर अपने पक्ष में फैसला निकलवा लेगा, जबकि कमजोर आदमी फंस जाएगा !! इस तरह जब भी कमजोर आदमी एवं ताकतवर आदमी की लड़ाई होगी तो ज्यादातर मामलो में ताकतवर आदमी जज का इस्तेमाल करके कमजोर आदमी को दवा देगा। कैसे ?

1. मान लीजिये, किसी साधारण आदमी का विवाद किसी विधायक से हो जाता है तो विधायक के खिलाफ फैसला देने से पहले जज सोचेगा कि, विधायक किसी न किसी तरह मुझे नुकसान पहुंचा सकता है। अत: जज ताकतवर आदमी (विधायक) के खिलाफ जाने का जोखिम नहीं उठाएगा। लेकिन एक साधारण आदमी के खिलाफ फैसला देने में जज के लिए न्यूनतम जोखिम है। लेकिन यदि किसी विधायक एवं मंत्री का मामला आता है तो जज मंत्री के पक्ष में फैसला दे देगा!! क्योंकि जजजानता है कि मंत्री हाई कोर्ट | सुप्रीम कोर्ट जजों से गठजोड़ बनाकर उसे नुकसान पहुंचा सकता है। 

2. इसी तरह से मान लीजिये कि A एक 500 करोड़ की पार्टी है और उसका एक मामला अदालत में है, और इस मामले में हजारो जनसाधारण लोग वादी के रूप में है। तब भी जज A से पैसा ले लेगा और कानून की कोई न कोई नजीर निकालकर उसके पक्ष में डिग्री दे देगा !! जज जानता है कि, A के खिलाफ फैसला देने से वह घूस की राशि से भी वंचित होगा एवं A के ऊँचे संपर्को के कारण भविष्य में जज के लिए जोखिम बढ़ जाएगा। 

- दुसरे शब्दों में, जज सिस्टम में अमीर आदमी के पास अपनी पहुँच एवं पैसे का इस्तेमाल करने का अवसर होता है, और जरूरत होने पर वे पैसा फेंक कर जजों को खरीद सकते है !! जज सिस्टम में ताकतवर लोग जजों से गठजोड़ बनाकर गलत वजहों से कारोबारी बढ़त एवं एकाधिकार बनाए रखने में सफल हो जाते है। जूरी सिस्टम ताकतवर को अतिरिक्त लाभ पहुंचाने वाली इस इस व्यवस्था को तोड़ देता है। यह एक बड़ी वजह है कि पूरी दुनिया में राजा, राजवर्ग, एवं धनिक हमेशा से जज सिस्टम के समर्थक एवं जूरी सिस्टम के खिलाफ रहे है।

(1.2) न्याय प्रणाली पर पेड मीडिया के प्रायोजको का रुख :
जूरी सिस्टम का तकनिकी विकास से गहरा सम्बन्ध है। जूरी सिस्टम के कारण बड़े पैमाने पर कारखाने लगने लगते है, और बड़े पैमाने पर तकनिकी वस्तुओ का उत्पादन होना संभव हो जाता है। और यह ऐतिहासिक रूप से सिद्ध है कि तकनिकी विकास अंततोगत्वा हथियारों की तकनीक की तरफ मुड़ जाता है। पेड मीडिया के प्रायोजक हथियारों की तकनीक पर नियंत्रण एवं एकाधिकार बनाए रखना चाहते है अत: वे जूरी सिस्टम के सख्त खिलाफ है। वे जूरी सिस्टम से इतनी घृणा करते है कि उन्होंने भारत की क़ानून, लोक प्रशासन, इतिहास, राजनीती शाख आदि विषयों की पेड पाठयपुस्तको से जूरी सिस्टम के बारे में सभी जानकारियां हटा दी है।

भारत में जूरी सिस्टम की मांग को टालने के लिए पेड मीडिया के प्रायोजक लगातार कई तरह के गलत तर्क देते आ रहे है। और उनके बेसिर पैर के बकवास तर्कों का केन्द्रीय बिंदु यही रहता है कि भारत में जूरी सिस्टम नहीं आना चाहिए।

पेड मीडिया द्वारा भारत में जूरी कोर्ट की मांग टालने के लिए दिए जाने वाले गलत तर्क।

● भारतीयों की शिक्षा का स्तर बेहद निम्न है, अत: पहले उन्हें शिक्षित होने की जरूरत है !! 
● आम भारतीय भ्रष्ट और स्वार्थी है, अत: उन्हें जूरी में आने के अधिकार नहीं दिए जाने चाहिए। 
● आम भारतीयों में शासित होने की मानसिकता है, अत: वे जज सिस्टम के ही लायक है।
● भारत के लोग जागरूक नहीं है, अत: जब वे जागरूक हो जायेंगे तब हम जूरी सिस्टम पर विचार करेंगे। 
● भारत में लोकतंत्र अभी इतना परिपक्व नहीं हुआ है, कि भारतीयों को जूरी में आने के राइट्स दिए जाए। 
● भारत में जूरी सिस्टम लाने का अभी 'राईट टाइम' नहीं आया है।

जूरी सिस्टम ; अब तक खोजी गयी सबसे ताकतवर प्रशासनिक प्रक्रिया जूरी सिस्टम की खोज इस प्रश्न का उत्तर ढूँढने के दौरान हुयी थी कि दंड देने की सर्वोच्च शक्ति किसे दी जानी चाहिए !! मानव समाज में जब भी कोई कानून बनाया जाता है तो उसमे यह भी जोड़ा जाता है कि यदि अमुक क़ानून तोडा गया तो इतनी उतनी सजा दी जायेगी। ताकतवर तबका जैसे राजा, राजवर्ग, धनिक आदि हमेशा यह चाहते है कि दंड देने की शक्ति रखने वाले आदमी को नियुक्त एवं निष्कासित करने का अधिकार उनके पास रहे। उन्हें ऐसी व्यवस्था चाहिए जिससे वे अवसर देखकर दंड देने की शक्ति रखने वाले व्यक्ति को दबा । खरीद सके। किसी भी राज्य में सबसे ताकतवर समूह राज वर्ग है। उनके पास काफी अधिकार एवं शक्तियां होती है, और वे इन शक्तियों का प्रयोग करके नागरिको को लूटना शुरु करते है। और दंड देने की शक्ति भी राज वर्ग के पास होने से वे यह लूट आसानी से चला पाते है।

अब समस्या यह है कि किस प्रकार की व्यवस्था की जाए कि राजवर्ग एवं ताकतवर लोग नागरिको का शोषण न कर सके।

(2) ग्रीस में जूरी सिस्टम का प्रादुर्भाव :-
 आज से लगभग 2500 साल पहले इस प्रश्न का उत्तर ग्रीस वासियों ने खोज निकाला था। उन्होंने यह तय किया कि यदि किसी नागरिक पर राजवर्ग या अन्य किसी व्यक्ति द्वारा कोई अभियोग लगाया जायेगा तो उसकी सुनवाई नागरिको के समूह द्वारा की जायेगी, राजा या राजा द्वारा नियुक्त किये गए किसी अधिकारी के द्वारा नहीं। और दंड देने की शक्ति भी इस नागरिक समूह के पास ही होगी। तो 500 ईसा पूर्व ग्रीस में जूरी सिस्टम आने के कारण दंड देने की शक्ति नागरिको की ज्यूरी के पास आ गयी, जिससे वे राजवर्ग से अपनी रक्षा कर पाए।

(2.1) एथेंस के जूरी सदस्यों के लिए जूरी टिकट :-
प्रत्येक वर्ष लगभग एथेंस के 6,000 नागरिको को जूरी टिकेट जारी किये जाते थे। ये आम नागरिक अदालतों में आकर मुकदमे सुनते थे, और अपना फैसला देते है। इस तरह एथेंस में तब सामान्य नागरिको की जूरी मुकदमे सुन रही थी। जब किसी नागरिक को मुकदमा सुनने की जिम्मेदारी दी जाती थी तो उसे कांस्य धातु का एक बिल्ला जारी किया जाता था। इस बिल्ले पर नागरिक का नाम एवं जिला भी खुदा होता था। धातु के इसी बिल्ले को जूरी टिकेट कहा जाता था। मुकदमा सुनने वाले जूरी मंडल में 100 तक सदस्य होते थे, और जूरी सदस्यों के बहुमत से फैसला किया जाता था। फैसला देने में जजों की भूमिका शून्य थी !!

Jury men's Tickets

Every year 6000 Athenians served as jurymen in law courts. They were allocated to court cases by putting a bronze ticket with their name and district into an allotment machine. Athenian trials had hundreds of jurors but no judges and the verdict was reached by majority vote.

Bronze dikast ticket of Deinias of Halai. About 360 BC

Burgon collection 
GR 1842. 7-28. 674B (Bronze 329)

(2.2) सुकरात को मृत्यु दंड का फैसला भी 500 नागरिको की जूरी ने दिया था, न की राजा ने।

सुकरात एथेंस से था, और उसे मृत्यु दंड की सजा 500 नागरिको की जूरी द्वारा दी गयी थी। एथेंस के 500 आम नागरिको ने सुकरात का मुकदमा सुना और उनमे से 380 नागरिको ने वोट किया कि सुकरात जो अपराध कर रहा है उसके लिए उसे मृत्यु दंड दे दिया जाना चाहिए। जूरी मंडल के अधिकांश सदस्य सुकरात को मारना नहीं चाहते थे, अत: उन्होंने ट्रायल से पहले सुकरात को एथेंस छोड़कर चले जाने को कहा, पर सुकरात ने एथेंस छोड़ कर जाने से मना कर दिया। ट्रायल के बाद भी कारागार के दरवाजे खुले रखे गए थे ताकि यदि वह जाना चाहता है चला जाए। सुकरात ने एथेंस छोड़कर जाने से इंकार कर दिया। अत: अंत में उसे जहर का प्याला पिलाया गया।

यहाँ एक प्रश्न यह भी उठता है कि-क्या सुकरात के साथ अन्याय हुआ और सुकरात ऐसा क्या अपराध कर रहा था कि 500 नागरिको की ज्यूरी में से 380 उसे मार दिए जाने या देश से निर्वासित करने पर सहमत थे?

दरअसल सुकरात के शान्ति उपदेशो के नतीजे में एथेंस के युवाओं में युद्ध के प्रति अरुचि पनपने लगी थी, और वे युद्ध कर्म के खिलाफ हो गए थे। यदि एथेंस में सुकरात के उपदेश जारी रहते थे तो बड़ी संख्या में युवा युद्ध में जाने से इनकार कर सकते थे। सुकरात का दर्शन सुनकर युवाओं को लगने लगा था कि युद्ध एक क्रूर कर्म है और हमें अहिंसा का अनुसरण करना चाहिए। तब सैन्य बल से ही राज्य की रक्षा की जाती थी। अत: एथेंस के नागरिक सेना कमजोर करने का जोखिम उठाने को तैयार नहीं थे। सेना कमजोर होने से एथेंस पर आक्रमण होता और वे युद्ध हार जाते !!

सुकरात को यदि एथेंस के राजा ने दंड दिया होता तो हम ये आरोप बना सकते थे कि राजा ने अन्यायपूर्वक सुकरात को मृत्युदंड दे दिया होगा। किन्तु सुकरात को मृत्यु दंड राजा ने नहीं दिया था, बल्कि नागरिको की ज्यूरी ने दिया था। और जूरी भी कोई 10-20 लोगो की नहीं थी, बल्कि 500 नागरिको को जूरी में बुलाया गया था। आप पेड इतिहासकारों द्वारा लिखी गयी पुस्तकें पढेंगे तो कहीं भी यह जिक्र नहीं मिलेगा कि सुकरात को नागरिको ने ही मृत्यु दंड दिया था, राजा ने नहीं। पेड इतिहासकारों ने इतिहास की किताबों में जूरी सिस्टम को दर्ज ही नहीं किया है। उल्टा सुकरात के प्रकरण को इस तरह लिखा गया है जिससे छात्रों के दिमाग में यह बात डाली जा सके कि सुकरात बहुत महान आदमी था और उसे अन्यायपूर्वक मार दिया गया !!

(3) ग्रीस पर जूरी सिस्टम का प्रभाव :
जब व्यक्ति कोई उद्योग लगाता है और ऐसी वस्तुएं बनाता है जिनकी काफी मांग हो, तो उसके पास काफी पैसा आने लगता है। पैसा आने के साथ ही राजवर्ग, अधिकारी एवं अपराधी उससे पैसा वसूलने के प्रयास शुरू कर देते है। यदि राजवर्ग के पास दंड देने की शक्ति हुई तो वे उस पर उल्टे सीधे आरोप लगाकर उससे पैसा खींचना शुरू करेंगे और उसके लिए कारोबार फैलाना महंगा एवं मुश्किल हो जायेगा। यदि दंड देने की शक्ति नागरिको की जूरी के पास है तो जूरी इस उत्पादक व्यक्ति की रक्षा करेगी जिससे वह और भी बेहतर तरीके से काम कर सकेगा। तो जूरी सिस्टम होने की वजह से ग्रीस के कारीगरों एवं इंजीनियरों को सरंक्षण मिला और वहां के ज्यादातर कारीगर निर्माण इकाइयां करने में सफल हुए।

निर्माण इकाइयां बढ़ने से उनमे प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हुयी और तकनिकी विकास में तेजी आयी। और जब भी किसी देश में तकनिकी विकास होगा तो अंततोगत्वा यह विकास हथियारों के निर्माण की तकनीको की और रुख कर लेता है। तो वहां के कारीगरों में तकनिकी निर्माण की एक प्रतियोगिता शुरू हुयी और उन्होंने दुनिया के सबसे बेहतर हथियारों का निर्माण कर लिया। अब सिकन्दर के पास वे हथियार थे जो पूरी दुनिया में किसी के भी पास नहीं थे। और यही वजह थी कि सिकंदर दुनिया के सबसे अधिक भू भाग को जीत सका। और ऐसा नहीं है कि ग्रीस में तकनिकी विकास सिर्फ हथियारों के क्षेत्र में ही हुआ था, बल्कि उन्होंने सभी क्षेत्रो में तकनिकी अविष्कार किये।

सिकंदर क्यों सफलतापूर्वक इतना बड़ा युद्ध अभियान चला पाया ? 
1. जूरी सिस्टम होने के कारण ग्रीस ने हल्की एवं मजबूत धातु का अविष्कार कर लिया था, जिसकी वजह से वे 18 फुट तक लम्बे भाले बना पाए !! इतने लम्बे होने के बावजूद इनमे नम्यता नहीं थी और ये हल्के भी थे। छह फुटी भालो का 18 फुट के भालो से कोई मुकाबला नहीं था।

2. ग्रीस वासी बेहतर गुलेले बना पाए। ये गुलेले 300 किलो के पत्थरो को 600 मीटर दूरी तक फेंक सकती थी। इनका इस्तेमाल किले की दीवारों को तोड़ने एवं दूर से ही सेना पर हमला करने के लिए किया जाता था। ग्रीक्स के केटापल्ट बहुत मारक थे!

3. जूरी सिस्टम के कारण ग्रीक बेहतर मचान बनाने में सफल हो गए थे। सिकन्दर की सेना किले की दीवार के जब मचान लगाती थी तो इनकी ऊंचाई किलो की दीवारों से भी ऊँची हो जाती थी। इससे किले की दीवारे हमला रोकने में नाकाम साबित हुयी। 

4. ग्रीस ने जीन यानी काठी भी बनायी !! तब तक भारत समेत शेष विश्व में घोड़ो पर बिना जीन के ही बैठा जाता था। जीन होने से घुड़सवार का संतुलन, घोड़े पर पकड़ एवं युद्ध करने की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। 

5. ग्रीस ने सस्ते एवं मुलायम चमड़े का उत्पादन बड़े पैमाने पर करना शुरू किया। चमड़ा सस्ता होने के कारण सैनिको का अधिकाँश शरीर चमड़े द्वारा आवृत होता था। यह चमड़ा मुलायम एवं हल्का था एवं तीर आदि इन्हें भेद नहीं पाते थे। जबकि शेष विश्व ने सैनिक भारी भरकम जिरह बख्तर लाद कर लड़ रहे थे। ग्रीक्स की ढाल भी काफी बड़ी एवं हल्की थी। सख्त चमड़े की बने होने के बावजूद यह इतनी हल्की थी कि इसे उठाया जा सकता था।

पेड इतिहासकारो ने इतिहास की पाठ्य पुस्तक में से इन 2 बिन्दुओ को बिलकुल गायब कर दिया है कि -

● एलेक्जेंडर के पास उस समय के सबसे ताकतवर हथियार थे जिसकी वजह से वह इतना बड़ा युद्ध अभियान चला पाया, और 
●आखिर ग्रीक शेष विश्व की तुलना में इतने बेहतर हथियार बनाने में कामयाब किस वजह से हो गए थे?

पेड मीडिया के प्रायोजक नहीं चाहते कि नागरिको को हथियारों के महत्त्व की सूचना दी जाए, अत: पेड इतिहासकार जन सामान्य से यह तथ्य छिपा लेते है कि जूरी सिस्टम किस तरह तकनीकी आविष्कार को प्रोत्साहित करके समुदाय को बेहतर हथियारों का निर्माण करने में सक्षम करता है। तो इतिहासकार जब सिकन्दर पर 100 पेज लिखेंगे तो उसके हथियारों की चर्चा सिर्फ 2 पेज में समेट देंगे, और शेष 98 पेज में यह सिद्ध करने का प्रयास करेंगे कि महत्त्वाकांक्षा, अनुशासन, साहस, कुशल रणनीति और एकता की वजह से एलेक्जेंडर इतना बड़ा युद्ध अभियान चला पाया था !!! जबकि तथ्य यह है कि जूरी सिस्टम के कारण ग्रीस के आम नागरिक राज वर्ग से अपने कारीगरों एवं कारखाना मालिको की रक्षा कर पाए और इस वजह से वे बड़े पैमाने पर उन्नत हथियार बनाने में सफल हुए। और बेहतर हथियार वह निर्णायक तत्व है जो युद्ध में जीत हार का फैसला करता है। साहस और वीरता जैसे तत्व बेहतर हथियारों का विकल्प नहीं हो सकते।

रोम में एक बड़ी आबादी (गुलाम वर्ग) के पास जूरी में आने का अधिकार नहीं था। वक्त गुजरने के साथ रोम के धनिक एवं राजवर्ग जूरी सिस्टम को कमजोर करते गए और रोम में जूरी प्रणाली ख़त्म हो गयी। जूरी सिस्टम कमजोर होने के साथ ही रोम कमजोर होना शुरू हो गया था और उनका पतन हुआ। फिर वाइकिंग ने जूरी प्रेक्टिस शुरू की। जब वाइकिंग इंग्लेंड आये तो उन्होंने 1050 ईस्वी में वहां जूरी सिस्टम इंट्रोड्यूस किया। और 150 साल बाद 12 वीं सदी में इंग्लैंड में जूरी सिस्टम आया। आप इसे मैग्राकार्टा के नाम से जानते है।

(4) 1050 ईस्वी यूरोप एवं ब्रिटेन में जूरी सिस्टम :- 

1200 ईस्वी में मैग्राकार्टा आने के बाद ब्रिटेन ऐसा दूसरा देश बना जहाँ जूरी सिस्टम लागू किया गया। मैग्राकार्टा के बाद राजा एवं राजवर्ग के पास नागरिको को दंड देने की शक्ति नहीं रह गयी थी। राजवर्ग सिर्फ आरोप लगा सकता था, लेकिन मुकदमे की सुनवाई नागरिको की जूरी के पास थी, एवं दंड भी जूरी ही देती थी। जूरी सिस्टम आने के साथ ही ब्रिटेन ने तेजी से तकनिकी विकास करना शुरू किया, और उन्होंने ऐसी वस्तुएं बना ली जो शेष दुनिया वाले नहीं बना पा रहे थे। तकनिकी वस्तुओ का अविष्कार के कारण वे बेहतर हथियार बना पाए और हथियारों के बल पर उन्होंने पूरी दुनिया में साम्राज्यों का अधिग्रहण किया। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण एवं निर्णायक हथियार बंदूक थी। ब्रिटेन में बड़े पैमाने पर बन्दूको की फैक्ट्रियां लगनी शुरू हुई, और ब्रिटेन ने बर्मिघम एवं लन्दन में बंदूके बनाने की कॉटज इंडस्ट्री 10 लाख बंदूके प्रति वर्ष की दर से उत्पादन कर रही थी।

(4.1) युरोपीय औद्योगिक क्रान्ति की वजह जूरी सिस्टम था, न कि पुनर्जागरण !! 
जूरी सिस्टम सिर्फ ब्रिटेन में ही नहीं रहा। अन्य यूरोपीय देशो जैसे फ्रांस, जर्मनी, इटली, पुर्तगाल, स्पेन आदि में भी जूरी प्रक्रियाएं लागू हुयी। और पूरे यूरोप ने तेजी से विकास करना शुरु किया। किन्तु ब्रिटेन की जूरी प्रक्रियाएं ज्यादा बेहतर थी इसीलिए उन्होंने ज्यादा तेजी से विकास किया और ज्यादा तकनिकी अविष्कार किये।

बाद में समय के साथ साथ अन्य यूरोपीय देशो में जूरी प्रक्रियाएं कमजोर होती चली गयी किन्तु ब्रिटेन में जूरी सिस्टम अपेक्षाकृत मजबूत बना रहा। जब पेड इतिहासकार औद्योगिक क्रान्ति की चर्चा करते है तो सारा क्रेडिट कथित पुनर्जागरण पर थपा देते है। और वे जानबूझकर इस प्रश्न की अवहेलना करते है कि पुनर्जागरण तो सबसे पहले इटली में हुआ था, फिर इटली ब्रिटेन की तुलना में पिछड़ कैसे गया !! दरअसल, छापेखाने से लेकर सभी प्रकार के तकनीकी अविष्कार (जिनकी कथित पुनर्जागरण में भूमिका थी) कारखानों में हो रहे तकनिकी अविष्कारों एवं उत्पादन के कारण आ रहे थे, पुनर्जागरण के कारण नहीं। असल में पुनर्जागरण अपने आप में प्रतिफल है, प्रक्रिया नहीं। यूरोपीय पुनर्जागरण के विचार यूरोप से पूरे विश्व में फैल चुके थे लेकिन दुनिया के किसी भी देश में इस कथित पुनर्जागरण के विचारो से कोई निर्णायक बदलाव नहीं आये। क्योंकि उन देशो के पास जूरी सिस्टम नहीं था। और जूरी सिस्टम के अभाव में वे बड़े पैमाने पर कारखाने खड़े करने में असफल रहे। और कारखाने नहीं होने के कारण वे ऐसी वस्तुएं नहीं बना सके जो ब्रिटिश बना रहे थे।

(5) दुनिया में सबसे बेहतर ज्यूरी प्रकियाएं अमेरिका में है :- 
ब्रिटिश ने जब अमेरिका का अधिग्रहण किया तो वहां के नागरिक ज्यूरी सिस्टम से परिचित हुए। अमेरिका में निचले स्तर पर ज्यूरी सिस्टम 1750 में आया, और जब अमेरिका ब्रिटेन से आजाद हुआ तो उन्होंने सभी स्तरों पर जरी प्रक्रियाएं लाग की। और जब अमेरिका का संविधान लिखा गया तो वहां के स्वतंत्रता सैनानी एवं कार्यकर्ता जूरी सिस्टम को संविधान का हिस्सा बनाने में सफल रहे।

यहाँ एक बात ध्यान देना जरुरी है कि जूरी सिस्टम की प्रभावशीलता इसके ड्राफ्ट पर निर्भर करती है। यदि ड्राफ्ट बेहतर होगा तो जूरी सिस्टम ज्यादा अच्छे नतीजे देगा। आज अमेरिका में दुनिया की सबसे बेहतर जूरी प्रक्रियाएं है। और चूंकि अमेरिका की जूरी प्रक्रियाएं ब्रिटेन की तुलना में ज्यादा बेहतर थी, अत: आजाद होने के बाद अमेरिका ने विस्फोटक रूप से तकनिकी विकास करना शुरू किया और अमेरिका जल्दी ही हथियारों की तकनीक में ब्रिटेन एवं शेष विश्व से आगे निकल गया।

I Consider trial byjury as the only anchor ever yet imagined by men, by which agoverment can beheld to the principles of itsconstiturion - Thomas Jefferso, author of declaration of independent.

मेरा मानना है कि ज्यूरी ट्रायल मानव जाति द्वारा खोजा गया एक मात्र लंगर है जो सरकार को संविधान एवं इसके सिद्धांतो का पालन करने के लिए सफलतापूर्वक बाध्य कर सकता है - थॉमस जेफरसन (अमेरिकी स्वतंत्रता घोषणा पत्र के लेखक)

अमेरिका में अदालतों के बेहतर होने की एक वजह वोट वापसी क़ानून भी है। जब वहां के नागरिक यह पाते है कि, अमुक जज भ्रष्ट आचरण कर रहा है तो वोट वापसी का प्रयोग करके उसे नौकरी से निकाल देते है। नागरिको द्वारा निकाले जाने का यह भय जजों को ईमानदार बनाए रखता है। जल्दी व निष्पक्ष दंड मिलने से अपराध में कमी आती है। और अपराध कम होने से देश की उत्पादकता बढ़ती है।

तो वोट वापसी कानूनो के अलावा जूरी सिस्टम होना दूसरी मुख्य वजह रही कि अमेरिका-ब्रिटेन भारत जैसे देशो से आगे, काफी आगे निकल गए। जूरी मंडल ने वहां के छोटे-मझौले कारोबारियों की जज-पुलिस-नेताओं के भ्रष्टाचार से रक्षा की और वे तकनिकी रूप से उन्नत विशालकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनियां खड़ी कर पाए।
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JuryCourt का ड्राफ्ट 👇👇
https://drive.google.com/drive/u/0/mobile/folders/1GYy9sHHk82jLXsk1Zym8V5sEx6UX9rSb?usp=sharing